दांडी मार्च - नमक यात्रा की चर्चा करें, और स्पष्ट करें कि किस प्रकार उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था? (Namak Andolan) Namak Yatra Kya Hai - 12 मार्च,1930

नमक यात्रा की चर्चा करें ! और स्पष्ट करें कि किस प्रकार उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था?

Question – नमक यात्रा की चर्चा करें ! और स्पष्ट करें कि किस प्रकार उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था?

उत्तर :- नमक यात्रा का सूत्रपात सविनय अवज्ञा आंदोलन से हुआ था । सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में किया गया एक ऐसा आंदोलन था जिसके जरिए गांधी जी ने भारत के सरकारी कर्मचारियों और ब्रिटिशर्स के अंतर्गत भारतीय  कर्मचारियों से यह आवहृन किया कि वह अपनी – अपनी नौकरियां छोड़ दें और भारत के आजादी के लिए इस आंदोलन का साथ दें ।

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देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांधी को नमक एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में दिखाई दिया। 31 जनवरी 1930 को उन्होंने वायसराय इरविन को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने 11 मांगों का उल्लेख किया। इनमें से तो कुछ मांगे सामान्य थी जबकि कुछ मांगे उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक के अधिकारों और विभिन्न तबकों से जुड़ी हुई मांगे थी । 



गांधी जी को ऐसा प्रतीत हुआ कि अगर वह सभी तबकों की मांग की बात करते हैं तो समाज के सभी वर्ग इस अभियान में और भारत देश को आजाद कराने में एकजुट होंगे ।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग नमक कर को समाप्त करना था। अंग्रेज ने हम भारतीयों के ऊपर नमक के प्रयोग पर कर लगाया हुआ था जिससे हमें नमक के प्रयोग में काफी पैसे चुकाने परते थे । और नमक का इस्तेमाल अमीर गरीब सभी करते थे। यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। महात्मा गांधी ने अपने पत्र में इस कर को हटाने की बात की थी और 11 मार्च तक वायसराय इरविन को अल्टीमेटम यानी चेतावनी देते हुए आंदोलन छेड़ने की बात कही थी लेकिन इरविन झुकने को तैयार नहीं था फलस्वरुप गांधी जी ने अपने 78 विश्वस्त वॉलिंटियर्स के साथ साबरमती के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी तक की यात्रा शुरू कर दी । प्रतिदिन 10 मील का सफर तय करते हुए 24 दिनों में 6 अप्रैल को दाढ़ी पहुंचे जहां उन्होंने 6 अप्रैल 1930 को ही समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया और नमक कानून को तोड़ा इस प्रकार ब्रिटिशर्स सरकार की अवज्ञा शुरू हो गई । और यही घटना नमक यात्रा के नाम से इतिहास में दर्ज है।





दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की जरूरत का वर्णन करें।

Question – दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की जरूरत का वर्णन करें।

उत्तर – उपभोक्ता जागरूकता की कई कारणों से आवश्यकता है

  1. उपभोक्ता जागरूकता इसलिए आवश्यक है क्योंकि अपने स्वार्थों से प्रेरित होकर दोनों-उत्पादक और व्यापारी कोई भी गलत काम कर सकते हैं। जैसे—वे खराब वस्तु दे सकते हैं, कम तौल सकते हैं, अपनी सेवाओं के अधिक मूल्य ले सकते हैं, आदि। धन के लालच के कारण ही समय-समय पर जरूरी वस्तुओं के दाम बहुत बढ़ जाते हैं।




  1. उपभोक्ता जागरूकता की इसलिए भी जरूरत है क्योंकि बेईमान व्यापारी अपने थोड़े से फायदे के लिए जनसाधारण के जीवन से खेलना शुरू कर देते हैं। जैसे विभिन्न खाद्य पदार्थों—दूध, घी, तेल, मक्खन, खोया और मसालों आदि में मिलावट करते हैं जिससे आम व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस कारण उपभोक्ता जागरूकता आवश्यक है जिससे व्यापारी हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ न कर सकें।

    More Questions:-

    > बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
    > भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई?

भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई? इसके विकास के बारे में पता लगाएँ।

Question – भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई? इसके विकास के बारे में पता लगाएँ।

उत्तर – उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत उपभोक्ताओं के असंतोष के कारण हुई क्योंकि विक्रेता कई अनुचित व्यवसायों में शामिल होते थे। बाजार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। यह माना जाता था कि एक उपभोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह एक वस्तु या सेवा को खरीदते समय सावधानी बरते । संस्थाओं को लोगों में जागरूकता लाने में भारत और पूरे विश्व में कई वर्ष लग गए। इन्होंने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दी।

भारत में सामाजिक बल के रूप में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म, अनैतिक और अनुचित व्यवसाय कार्यों में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के फलस्वरूप हुआ। अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट की वजह से 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय हुआ। 1970 तक उपभोक्ता संस्थाएँ बड़े पैमाने पर उपभोक्ता अधिकार से संबंधित आलेखों के लेखन और प्रदर्शन का आयोजन करने लगीं। इसके लिए उपभोक्ता दल बनाए गए। भारत में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई ।




इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप यह आंदोलन वृहत्त स्तर पर उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ और अनुचित
व्यवसाय शैली को सुधारने के लिए व्यवसायिक कंपनियों और सरकार दोनों पर दबाव डालने में सफल हुआ।


More Questions:-

बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई?

बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।

1. बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।

उत्तर बाजार में नागरिक की सुरक्षा के लिए नियम एवं नियंत्रण की आवश्यकता होती है क्योंकि जब उपभोक्ताओं का शोषण होता है तो उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमजोर स्थिति में पाते हैं। खरीदी गई वस्तु या सेवा के बारे में जब भी कोई शिकायत होती है तो विक्रेता सारे उत्तरदायित्व क्रेता पर डालने का प्रयास करता है। विक्रेता कई तरीकों से उपभोक्ता का शोषण कर सकता है। ऐसी स्थिति से उपभोक्ता को बचाने के लिए उपभोक्ता आंदोलन चलाए गए जिससे बाजार में सुरक्षा मिले। बाज़ार में शोषण कई रूपों में होता है, जैसे—कभी-कभी व्यापारी अनुचित व्यापार करने लग जाते हैं, कम तौलने लगते हैं। या मिलावटी वस्तुएँ बेचने लगते हैं। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए समय-समय पर मीडिया और अन्य स्रोतों से गलत सूचना देते हैं। अतः उपभोक्ताओं की सुरक्षा निश्चित करने के लिए नियम और नियंत्रण की आवश्यकता होती है।




More Questions From Political Science

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Chanakya – All Things You Should Know

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Chanakya Ethics And Fact

All things begin with counsel. Chanakya loyalty and obedience of his people. Before taking office, the sovereign needs assistance from experienced and knowledgeable teachers.

Once instated, a wise sovereign does not rely solely on his own wisdom but can turn to trusted ministers and advisors for counsel. In Chanakya’s view, such individuals are as important as the sovereign in governing the state. In Arthashastra, Chanakya states: “Governance is possible only with assistance—a single wheel does not move.” This is a warning to the sovereign not to be autocratic, but to arrive at decisions of state after consulting his ministers.

The appointment of ministers with the necessary qualifications is therefore just as important as the people’s choice of leader. The ministers can provide a range of knowledge and skills. They must be utterly trustworthy, not only so that the sovereign can rely on their advice, but also to ensure that decisions are made in the interests of the state and its people—if necessary, preventing a corrupt ruler from acting in his own interests.




The end justifies the means It was this recognition of the realities of human nature that distinguished Chanakya from other Indian political philosophers of the time. Arthashastra is not a work of moral philosophy, but a practical guide to governance, and in ensuring the welfare and security of the state it often advocates using whatever means are necessary. Although Arthashastra advocates a regime of learning and self-discipline for an ideal ruler and mentions certain moral qualities, it doesn’t flinch from describing how to use underhanded methods to gain and maintain power. Chanakya was a shrewd observer of human weaknesses as well as strengths, and he was not above exploiting these to increase the sovereign’s power and undermine that of the sovereign’s enemies.

This is particularly noticeable in his advice on defending and acquiring territory. Here he recommends that the ruler and his ministers should carefully assess the strength of their enemies before deciding on a strategy to undermine them. They can then choose from a number of different tactics, ranging from conciliation, encouraging dissent in the enemy’s ranks, and forming alliances of convenience with other rulers, to the simple use of military force. In deploying these tactics, the ruler should be ruthless, using trickery, bribery, and any other inducements deemed necessary. Although this seems contradictory to the moral authority Chanakya advocates in a leader, he stipulates that after the victory has been achieved, the ruler should “substitute his virtues for the defeated enemy’s vices, and where the enemy was good, he shall be twice as good.”

Intelligence and espionage Arthashastra reminds rulers that military advisors are also needed, and the gathering of information is important for decision-making. A network of spies is vital in assessing the threat posed by neighboring states or to judge the feasibility of acquiring territory, but Through ministerial eyes, others’ weaknesses are seen. Chanakya goes further, suggesting that espionage within the state is also, a necessary evil in order to ensure social stability. At home and in international relations, morality is of secondary importance to the protection of the state. The state’s welfare is used as justification for clandestine operations, including political assassination, should this be necessary, aimed at reducing the threat of opposition.

This amoral approach to taking and holding on to power and the advocacy of strict enforcement of law and order can be seen either as shrewd political awareness or as ruthlessness and has earned Arthashastra’s comparison with Machiavelli’s The Prince, written around 2,000 years later. However, the central doctrine, of rule by a sovereign and ministers has more in common with Confucius and Mozi, or Plato and Aristotle, whose ideas Chanakya may have come across as a student in Takshashila. A proven philosophy The advice contained in the pages of Arthashastra soon proved its usefulness when adopted by Chanakya’s protegé Chandragupta

Elephants played a big role in Indian warfare, often terrifying enemies so much that they would withdraw rather than fight. Chanakya developed new strategies for warfare with elephants.

Maurya, who successfully defeated King Nanda to establish the Mauryan empire in around 321 BCE. This became the first empire to cover the majority of the Indian subcontinent, and Maurya also successfully held off the threat from Greek invaders led by Alexander the Great. Chanakya’s ideas were to influence government and policy-making for several centuries until India eventually succumbed to Islamic and Mughal rule in the Middle Ages.




The text of Arthashastra was rediscovered in the early 20th century, and regained some of its importance in Indian political thinking, gaining iconic status after India won independence from Great Britain in 1948. Despite its central place in Indian political history, it was little known in the West, and it is only recently that Chanakya has been recognized outside India as a significant political thinker.

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कांग्रेस का पतन। Political Science (Class 12)

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लोकसभा चुनाव समाप्ति पश्चात हारे हुए दलों की आत्ममंथन चल रही है | ऐसा क्या हुआ की ऐसी दुर्गति कभी सपनों में भी नहीं आई थी | चाहे वो कांग्रेस हो, आम आदमी पार्टी हो, समाज वादी पार्टी हो, बसपाहो, राजद हो या जदयु हो या कोई और हो, सब के मन में कहीं ना कहीं आत्ममंथन चल रही है | किन्तु भले ही आत्ममंथन, आत्मचिंतन कर रहे हो, लेकिन वे सब जानते है की वे सब क्यूं हारे | कोई जवाबदारी लेना नहीं चाहता | विशेष रूप से कांग्रेस | भले ही थोड़ी देर के लिये सोनिया गाँधी हारी हुई बाज़ी की जवाबदारी ली और अपनी इस्तीफा पेश करने के बाद कांग्रेस द्वारा अस्वीकार कर दी गयी | किन्तु हिन्दुस्तान की जनता सब समझती है, शिक्षित वर्ग सब जानती है | लेकिन कबतक दिखावा करते रहेंगे ?

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जैसे पहेले हमें पढ़ाया जाता था मोगल साम्राज्य का पतन, ब्रिटिश शासन का पतन का कारण क्या है ऐसे ही कांग्रेस का पतन का कारण भी इतिहास में दर्ज हो गया | एक मामूली आदमी भी बता सकता है कांग्रेस क्यूं हारी | इसमे इतना आत्ममंथन, आत्मचिंतन करने की ज़रूरत नहीं |

जो कारण है यही है:
1. कांग्रेस शासन काल में भ्रष्टाचार को बढ़ावा
2. महंगाई रोकने में असमर्थ
3. आम आदमी खास कर महिलाओं को सुरक्षा ना दे पाना
4. प्रधानमंत्री को पूर्ण अधिकार ना देना
5. कालाधन की वापसी के बारे में यथार्थ प्रयास ना करना
6. राहुल और सोनिया जी की चारों और चाटुकारों की उपस्थिति
7. हिन्दुस्तान की जनता की ज़मीनी हकीकत से रूबरु ना होना
8. चुनाव के समय दूसरे दलों पर ज़्यादा टिपणियां करना
9. चुनाव के समय हिन्दुस्तान की विकास के बारे में कुछ ना बोलना
10.दागी उमीदवारों को चुनाव के लिये टिकेट देना
11.धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्योंको से सपोर्ट माँगना

यह तो थोड़े से ही बिन्दुएं है जिस पर कांग्रेस को सोचना पड़ेगा | अगर सही मायने में सोनिया जी राहुल को इस देश की प्रधानमंत्री बनाना चाहती है ( अब तो 2019 चुनाव की बात कर सकते है), तो ऊपरवाले बिन्दुओं पर गौर करना होगा और अपनी छबि सुधारनी होगी | और आखिर में यह भी ध्यान देना योग्य है की अगर भाजपा अपनी कार्यकाल में कोई गलती करे तो ही जनता की मूड बदलने में आसानी होगी, और फिर कांग्रेस या किसी और दल के बारे में सोच सकती है |


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Charter Act of 1853

This was the last of the series of Charter Acts passed by the British Parliament between 1793 and 1853. It was a significant constitutional landmark.

The features of this Act were as follows:

1. It separated, for the first time, the legislative and executive functions of the Governor-General’s council. It provided for the addition of six new members called legislative councilors to the council. In other words, it established a separate Governor-General’s legislative council which came to be known as the Indian (Central) Legislative Council. This legislative wing of the council functioned as a mini-Parliament, adopting the same procedures as the British Parliament. Thus, legislation, for the first time, was treated as a special function of the government, requiring special machinery and special process.

2. It introduced an open competition system of selection and recruitment of civil servants. The covenanted civil service was, thus, thrown open to the Indians also. Accordingly, the Macaulay Committee (the Committee on the Indian Civil Service) was appointed in 1854.

3. It extended the Company’s rule and allowed it to retain the possession of Indian territories on trust for the British Crown. But, it did not specify any particular period, unlike the previous Charters. This was a clear indication that the Company’s rule could be terminated at any time the Parliament liked.

4. It introduced, for the first time, local representation in the Indian (Central) Legislative Council. Of the six new legislative members of the GovernorGeneral’s council, four members were appointed by the local
(provincial) governments of Madras, Bombay, Bengal, and Agra

Charter Act of 1833

This Act was the final step towards centralization in British India.

The features of this Act were as follows:
1. It made the Governor-General of Bengal as the Governor-General of India and vested in him all civil and
military powers. Thus, the act created, for the first time, the Government of India having authority over the entire territorial area possessed by the British in India. Lord William Bentick was the first Governor-General of India.

2. It deprived the Governor of Bombay and Madras of their legislative powers. The Governor-General of
India was given exclusive legislative powers for entire British India. The laws made under the previous
acts were called as Regulations, while laws made under this act were called Acts.

3. It ended the activities of the East India Company as a commercial body, which became a purely
administrative body. It provided that the Company’s territories in India were held by it ‘in trust for His
Majesty, His heirs, and successors’.

4. The Charter Act of 1833 attempted to introduce a system of open competition for the selection of civil servants and stated that the Indians should not be debarred from holding any place, office, and employment under the Company. However, this provision was negated after opposition from the Court of Directors.

Charter Act of 1813

The features of this Act were as follows:
1. It abolished the trade monopoly of the company in India i.e., the Indian trade was thrown open to all British merchants. However, it continued the monopoly of the company over trade in tea and trade with China.
2. It asserted the sovereignty of the British Crown over the Company’s territories in India.
3. It allowed the Christian missionaries to come to India for the purpose of enlightening the people.
4. It provided for the spread of western education among the inhabitants of the British territories in India.
5. It authorized the Local Governments in India to impose taxes on persons. They could also punish the persons for not paying taxes.

Charter Act of 1793

The features of this Act were as follows:
1. It extended the overriding power given to Lord Cornwallis over his council, to all future Governor Generals and Governors of Presidencies.
2. It gave the Governor-General more powers and control over the governments of the subordinate Presidencies of Bombay and Madras.
3. It extended the trade monopoly of the Company in India for another period of twenty years.
4. It provided that the Commander-in-Chief was not to be a member of the Governor-General’s council
unless he was so appointed.
5. It laid down that the members of the Board of Control and their staff were, henceforth, to be paid out of the Indian revenues.